Thursday, 25 April 2013

Kabhi

वक़्त की सुराही से लम्हे
धीरे धीरे रीत रहे हैं--
अटक अटक कर, ठिठक ठिठक कर।
एक सोता फूट कर उभरे अगर...
ये तरसते लम्हे जी भर
भीग तो जाएँ...
वक़्त की तह में दबाकर रोंदते जिसको रहे 
उस दिल की ये जुर्रत- उठे और मुझसे कहे-
सच कहीं कुछ भी नहीं, धडकनों मैं कैद है 
आरज़ू मैं आशना और पुतलियों मैं ज़ेब है. 
जब तलक है साँस, मुझमें आस बाकी है कहीं 
रूह मैं जिंदा रहूँ, ये प्यास बाकी है कहीं ..
तुम मेरे एहसास मैं कैद होकर भी नहीं
और इज़ाज़त हो अगर जाने की,
तो क्या रुक जाओगे?

केंचुले उतरी कई मेरी मगर तुम न गए
रूह की हर एक नस
निचोडू तो क्या छट जाओगे?

पूछ लूँ तुम से ही क्या है इस नशे की इन्तहा..
और अगर उतरे नहीं ताउम्र
तो क्या शरमाओगे?

तुम नहीं बदलोगे इसका है यकीन मुझको मगर
प्यार करने की सजा मे
प्यार तो कर पाओगे?